टाटा ट्रस्ट का बड़ा फैसला: गैर-पारसियों के ट्रस्टी बनने पर लगी रोक हटेगी

HIGHLIGHTS
- टाटा ट्रस्ट्स ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले के तहत बाई हीराबाई जमशेदजी टाटा नवसारी चैरिटेबल इंस्टीट्यूशन (बाई हीराबाई ट्रस्ट) से जुड़े पुराने नियमों में बदलाव की प्रक्रिया शुरू करने का ऐलान किया है।
- ट्रस्ट ने कहा है कि वह ट्रस्टी बनने की पात्रता में मौजूद उन शर्तों को हटाने के लिए कानूनी कदम उठाएगा, जिनमें गैर-पारसी व्यक्तियों को ट्रस्टी बनने से रोका गया है।
- विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
- इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में पूर्व ट्रस्टी मेहली मिस्त्री द्वारा महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के पास दर्ज कराई गई…
टाटा ट्रस्ट्स ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले के तहत बाई हीराबाई जमशेदजी टाटा नवसारी चैरिटेबल इंस्टीट्यूशन (बाई हीराबाई ट्रस्ट) से जुड़े पुराने नियमों में बदलाव की प्रक्रिया शुरू करने का ऐलान किया है। ट्रस्ट ने कहा है कि वह ट्रस्टी बनने की पात्रता में मौजूद उन शर्तों को हटाने के लिए कानूनी कदम उठाएगा, जिनमें गैर-पारसी व्यक्तियों को ट्रस्टी बनने से रोका गया है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में पूर्व ट्रस्टी मेहली मिस्त्री द्वारा महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के पास दर्ज कराई गई शिकायत है। उन्होंने आरोप लगाया था कि उद्योगपति वेणु श्रीनिवासन और पूर्व रक्षा सचिव विजय सिंह की ट्रस्टी के रूप में नियुक्ति ट्रस्ट के नियमों के अनुरूप नहीं है। उनका कहना था कि ट्रस्ट डीड के अनुसार ट्रस्टी के लिए पारसी (जोरास्ट्रियन) समुदाय से होना और मुंबई का निवासी होना जरूरी है, जबकि दोनों अधिकारी इन मानकों पर खरे नहीं उतरते।
बोर्ड बैठक में अहम फैसला
विवाद बढ़ने के बाद 17 अप्रैल 2026 को टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा की अध्यक्षता में बोर्ड की बैठक हुई। बैठक में ट्रस्टियों ने कहा कि टाटा समूह की नींव समावेशिता और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर आधारित है। इसी भावना के अनुरूप ट्रस्ट ने यह निर्णय लिया कि पुराने दस्तावेजों में मौजूद प्रतिबंधात्मक प्रावधानों को संशोधित करने के लिए संबंधित प्राधिकरण के समक्ष प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
1916 की वसीयत और 1923 की डीड का अंतर
टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि बाई हीराबाई ट्रस्ट की मूल स्थापना 1916 में सर रतन टाटा की वसीयत के तहत हुई थी, जिसमें किसी तरह का धार्मिक या जातिगत प्रतिबंध शामिल नहीं था। हालांकि 1923 में तैयार की गई ट्रस्ट डीड में बाद में कुछ शर्तें जोड़ दी गईं। ट्रस्ट का तर्क है कि अब वह मूल संस्थापक की भावना के अनुरूप व्यवस्था को बहाल करने की दिशा में काम कर रहा है।
इस्तीफे और मौजूदा स्थिति
इस विवाद के बीच वेणु श्रीनिवासन ने ट्रस्टी पद से इस्तीफा दे दिया है। बताया जा रहा है कि यह कदम आंतरिक सहमति बनाने के प्रयासों के तहत उठाया गया। वहीं ट्रस्ट ने सीईओ सिद्धार्थ शर्मा के कामकाज पर भरोसा जताया है।
दूसरी ओर, मेहली मिस्त्री के करीबी सूत्रों का कहना है कि नियमों में बदलाव की यह पहल इस बात का संकेत है कि अब तक की कुछ नियुक्तियों पर सवाल खड़े हो सकते हैं। फिलहाल मामला चैरिटी कमिश्नर के पास विचाराधीन है।
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