बागपत: रक्षाबंधन पर बहन ने भाई को दिया जिंदगी का तोहफा, किडनी देकर बचाई जान

HIGHLIGHTS
- मुकेश की दोनों किडनियां खराब होने के बाद बढ़ी थी परेशानी
- करीब एक साल तक 40 से अधिक बार करानी पड़ी डायलिसिस
- पत्नी मोनिका की किडनी ब्लड ग्रुप मैच न होने से नहीं लग सकी
बागपत। रक्षाबंधन पर बहनें आमतौर पर भाइयों की लंबी उम्र की कामना करते हुए उनकी कलाई पर राखी बांधती हैं, लेकिन दोघट की सुशीला ने अपने भाई मुकेश शर्मा की जिंदगी बचाने के लिए अपनी एक किडनी दान कर दी। करीब आठ साल पहले सिरदर्द और बढ़े हुए ब्लड प्रेशर की समस्या के बाद मुकेश की दोनों किडनियां खराब हो गई थीं। लगभग एक साल तक डायलिसिस कराने के बाद चिकित्सकों ने किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत बताई। पत्नी की किडनी उपयुक्त नहीं मिलने पर बहन सुशीला ने आगे बढ़कर भाई को अपनी किडनी देने का फैसला किया।
दोघट निवासी मुकेश शर्मा सरधना ब्लॉक के एक पूर्व माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक हैं। वर्ष 2004 में उनकी शादी मोनिका से हुई थी। उनके दो बच्चे पार्थ और दिव्यांशु हैं। वर्ष 2011 से उन्हें लगातार सिरदर्द और ब्लड प्रेशर बढ़ने की शिकायत रहने लगी। निजी चिकित्सक से उपचार के बावजूद उनकी स्थिति धीरे-धीरे खराब होती गई और दोनों किडनियां खराब हो गईं। इसके बाद नियमित डायलिसिस शुरू हुई। बीमारी के गंभीर दौर में करीब एक साल तक उनकी डायलिसिस चली। 40 से अधिक बार डायलिसिस होने के कारण उनका शरीर काफी कमजोर हो गया।
चिकित्सकों ने किडनी ट्रांसप्लांट को ही स्थायी उपचार बताया। परिवार ने सबसे पहले पत्नी मोनिका की किडनी ट्रांसप्लांट के लिए जांच कराई, लेकिन उनका ब्लड ग्रुप मैच नहीं हुआ और वह मुकेश के लिए उपयुक्त नहीं पाई गईं। भाई की बिगड़ती हालत को देखते हुए बड़ी बहन सुशीला ने किडनी देने का निर्णय लिया। आवश्यक चिकित्सकीय जांच में उनकी किडनी मुकेश के लिए उपयुक्त मिली। इसके बाद वर्ष 2018 में मुकेश का किडनी ट्रांसप्लांट किया गया। बहन की किडनी मिलने के बाद उनकी जिंदगी दोबारा सामान्य होने लगी और परिवार को भी बड़ी राहत मिली।
मुकेश शर्मा कहते हैं कि माता-पिता के बाद भाई-बहन का रिश्ता ऐसा होता है, जो कठिन समय में सबसे मजबूत सहारा बनता है। उनका कहना है कि सुशीला ने उनके लिए जो किया, उसका अहसान वह जीवनभर नहीं भूल सकते।
वहीं सुशीला का कहना है कि भाई से बढ़कर दुनिया में कोई दूसरा रिश्ता नहीं है। माता-पिता के बाद मुश्किल समय में भाई-बहन को एक-दूसरे का साथ देना चाहिए। भाई की जिंदगी बचाने का अवसर मिलना उनके लिए इससे बड़ा सौभाग्य नहीं हो सकता।
परिवार के लिए अब रक्षाबंधन केवल राखी बांधने का त्योहार नहीं है, बल्कि उस त्याग और समर्पण को याद करने का दिन भी है, जिसने मुश्किल दौर में भाई को जिंदगी की नई उम्मीद दी।
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