वैवाहिक दुष्कर्म मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा- केंद्र का रुख जानने के बाद तय होगी सुनवाई की तारीख

HIGHLIGHTS
- मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ मामले की सुनवाई कर रही है।
- पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं।
- वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने नवंबर में सुनवाई के लिए तारीख तय करने की मांग की।
नई दिल्ली। वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध की श्रेणी में शामिल करने की मांग से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि केंद्र सरकार का पक्ष जानने के बाद मामले की सुनवाई के लिए उचित तारीख तय की जाएगी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने नवंबर में सुनवाई के लिए निश्चित तारीख देने का अनुरोध किया। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं।
बुधवार को होने वाली सुनवाई में क्या होगा?
इंदिरा जयसिंह ने कहा कि ये मामले बुधवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हैं, लेकिन केंद्र की ओर से अभी तक विस्तृत जवाब दाखिल नहीं किया गया है। उन्होंने बताया कि केंद्र ने फिलहाल केवल शुरुआती आपत्ति दाखिल की है और याचिकाकर्ताओं के बीच भी सभी याचिकाओं का आदान-प्रदान नहीं हुआ है।
उनका कहना था कि पक्षकारों को अभी यह भी स्पष्ट नहीं है कि अलग-अलग याचिकाओं में कितनी समानताएं और कितने अंतर हैं। इस पर पीठ ने कहा कि बुधवार को केंद्र का पक्ष सुना जाएगा और इसके बाद सुनवाई के लिए उचित तारीख तय की जाएगी। वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने भी कहा कि ऐसी तारीख निर्धारित की जा सकती है, जिससे सभी पक्ष अपनी दलीलों की तैयारी पूरी कर सकें।
मामला आखिर किस कानून और किस सवाल पर है?
इन याचिकाओं में वैवाहिक दुष्कर्म से संबंधित आपराधिक कानून के प्रावधानों की संवैधानिक वैधता और उनकी व्याख्या को चुनौती दी गई है। पुराने भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में अपवाद था, जिसके तहत 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र की पत्नी के साथ पति द्वारा यौन संबंध या यौन कृत्य को दुष्कर्म नहीं माना जाता था।
भारतीय दंड संहिता अब समाप्त हो चुकी है, लेकिन नए कानून भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 में भी इसी तरह का अपवाद मौजूद है। नए आपराधिक कानून 1 जुलाई 2024 से लागू हुए और उन्होंने भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता तथा साक्ष्य अधिनियम का स्थान लिया।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले केंद्र से कब जवाब मांगा था?
सुप्रीम कोर्ट ने 16 जनवरी 2023 को उन याचिकाओं पर केंद्र से जवाब मांगा था, जिनमें वयस्क पत्नी के साथ जबरन यौन संबंध बनाने पर पति को आपराधिक कार्रवाई से मिलने वाली सुरक्षा को चुनौती दी गई थी। इसके बाद नए भारतीय न्याय संहिता में मौजूद प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर भी केंद्र को नोटिस जारी किया गया।
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क है कि पति को दिया गया यह कानूनी अपवाद विवाहित महिलाओं के साथ भेदभाव करता है और संविधान में दिए गए कानून के सामने समानता के अधिकार से जुड़ा सवाल खड़ा करता है।
दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला क्यों बना अहम?
मामले से जुड़ी एक याचिका दिल्ली हाईकोर्ट के 11 मई 2022 के विभाजित फैसले के खिलाफ है। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति राजीव शकधर और न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर की पीठ इस मुद्दे पर एकमत नहीं थी।
न्यायमूर्ति शकधर ने वैवाहिक दुष्कर्म के अपवाद को असंवैधानिक मानते हुए इसे हटाने के पक्ष में फैसला दिया था। उन्होंने कहा था कि भारतीय दंड संहिता लागू होने के 162 साल बाद भी यदि किसी विवाहित महिला की न्याय की पुकार नहीं सुनी जाती है तो यह दुखद होगा।
वहीं न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर ने इस अपवाद को असंवैधानिक नहीं माना था और कहा था कि यह अलग कानूनी वर्गीकरण पर आधारित है। दोनों न्यायाधीशों ने मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की अनुमति दी थी, क्योंकि इससे महत्वपूर्ण कानूनी सवाल जुड़े थे।
क्या दूसरे हाईकोर्ट ने भी पति को मिली छूट पर सवाल उठाया?
कर्नाटक हाईकोर्ट पहले ही कह चुका है कि पति को पत्नी के साथ दुष्कर्म और अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोपों से छूट देना संविधान के अनुच्छेद 14 यानी कानून के सामने समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिकाओं में भी पुराने भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में मौजूद वैवाहिक दुष्कर्म अपवाद की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है। अब नए भारतीय न्याय संहिता में भी समान अपवाद मौजूद होने के कारण सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है कि विवाह के आधार पर पति को दी गई यह कानूनी सुरक्षा संविधान की कसौटी पर टिकती है या नहीं।
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