संभल हिंसा: सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत रद्द की, UP सरकार पर 10 लाख का जुर्माना

HIGHLIGHTS
- सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार 29 सितंबर को सुनाया फैसला
- जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने की सुनवाई
- इलाहाबाद हाई कोर्ट का डिटेंशन ऑर्डर बरकरार रखने वाला फैसला पलटा
- 13 अक्टूबर 2025 को NSA के तहत जारी हुआ था डिटेंशन ऑर्डर
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा मामले में मुल्ला अफरोज की नेशनल सिक्योरिटी एक्ट, 1980 के तहत हिरासत रद्द कर दी है। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।
मुल्ला अफरोज पर 2024 में हुई संभल हिंसा का मास्टरमाइंड होने का आरोप लगाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को भी पलट दिया, जिसमें डिटेंशन ऑर्डर को बरकरार रखा गया था।
उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने मंगलवार, 29 सितंबर को संभल हिंसा मामले में फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) के लिए केवल 'एक्स्ट्रा-जुडिशियल कन्फेशन' (न्यायालय के बाहर किया गया कबूलनामा) को एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।
कोर्ट ने गैर-कानूनी प्रिवेंटिव डिटेंशन ऑर्डर जारी करने के मामले में सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। अदालत ने कहा कि हिरासत का आदेश जारी करने वाले अधिकारी को अन्य संबंधित परिस्थितियों पर भी विचार करना चाहिए। कोर्ट के मुताबिक, अफरोज के मामले में अधिकारियों ने ऐसा नहीं किया और अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया।
क्या है मामला?
याचिकाकर्ता मुल्ला अफरोज संभल हिंसा मामले में आरोपी है। संभल में यह हिंसा शाही जामा मस्जिद के कोर्ट-ऑर्डर सर्वे के बाद हुई थी, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई थी।
मुल्ला अफरोज को हिंसा की घटना के करीब 54 दिन बाद गिरफ्तार किया गया था। यह गिरफ्तारी पुलिस कस्टडी में दिए गए कबूलनामे के आधार पर हुई थी। हालांकि, बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उसे जमानत दे दी थी।
13 अक्टूबर 2025 को मुल्ला अफरोज के खिलाफ NSA के तहत डिटेंशन ऑर्डर जारी किया गया था। बाद में हाई कोर्ट ने इस डिटेंशन ऑर्डर को सही ठहराया, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता ने दलील दी कि हिंसा के दौरान पुलिस ने खुद गोली चलाई थी और इस पहलू की निष्पक्ष जांच नहीं की गई। उसने इस मामले में प्रोटेस्ट पिटीशन (विरोध याचिका) दाखिल करने की अनुमति मांगी।
पुलिस कस्टडी में कही गई बात को आधार नहीं माना जा सकता
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि मुल्ला अफरोज की गिरफ्तारी पुलिस कस्टडी में दिए गए कबूलनामे के आधार पर हुई थी, जो कानून की नजर में मान्य नहीं है।
प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) के मामले में उन्होंने कहा कि मुल्ला अफरोज के नाम कई आपराधिक मामले होना मात्र हिरासत में लेने को सही नहीं ठहरा सकता। इसके लिए पर्याप्त सबूतों का होना जरूरी है।
'रेखा बनाम तमिलनाडु राज्य' और 'अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य' मामलों का हवाला देते हुए यह तर्क दिया गया कि यदि किसी ठोस सबूत के बिना केवल इस बात की आशंका हो कि हिरासत में लिया गया व्यक्ति दोबारा अपराध में शामिल हो सकता है, तो यह प्रिवेंटिव डिटेंशन का उचित आधार नहीं हो सकता।
वहीं, हिरासत के आदेश का बचाव करते हुए राज्य ने कहा कि याचिकाकर्ता से हिंसा फैलाने या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने की आशंका है।
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