अतरौली के दिग्गज नेता डॉ. अनवार खान का निधन, 89 साल की उम्र में ली अंतिम सांस

HIGHLIGHTS
- वह लगातार 20 साल तक सभासद के पद पर रहे।
- 1980 में कांग्रेस के टिकट पर पहली बार विधायक चुने गए।
- उन्होंने उस चुनाव में कल्याण सिंह को हराया था।
अलीगढ़। यूपी के अलीगढ़ स्थित अतरौली की राजनीति के भीष्म पितामह कहे जाने वाले पूर्व विधायक और दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री डॉ. अनवार खान का मंगलवार देर रात 89 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके निधन की खबर से पूरे अतरौली क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। उनके आवास पर पुत्र शाकिब अनवार और नवेद अनवार को ढांढस बंधाने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। समर्थकों, नेताओं और आम जनता का तांता लगा रहा। पाली रोड स्थित कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया।
कल्याण सिंह को हराकर रचा था इतिहास
डॉ. अनवार खान ने देश की राजनीति को पहले आम चुनाव की सादगी से लेकर गाड़ियों के काफिलों वाली मौजूदा राजनीति तक देखा था। अतरौली उनकी कर्मभूमि रही, जिसे प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कल्याण सिंह का गढ़ माना जाता है। इसी गढ़ में कल्याण सिंह को हराकर उन्होंने इतिहास रचा था। इसी वजह से उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।
जब 50 हजार में जीत गए थे चुनाव, प्रचार को आई थीं इंदिरा गांधी
आज जहां चुनाव में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, वहीं डॉ. अनवार खान ने 1980 में प्रचार पर मात्र 50 हजार रुपये खर्च कर चुनाव जीत लिया था। उस समय प्रचार एक जीप से होता था और जनता से सीधे उनके घर जाकर संवाद किया जाता था।
1980 के चुनाव में उनके समर्थन में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद अतरौली पहुंची थीं। उन्होंने जनसभा में जनता से अपील की थी, "अनवार को जिता दो, यहां का विकास मेरी जिम्मेदारी है।" उस दौरान इंदिरा गांधी ने पगडंडियों पर चलकर जनसंपर्क किया।
सिविल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष चंद्रशेखर राजपूत और बच्चू सिंह एडवोकेट के अनुसार, विधायक बनने के बाद डॉ. अनवार खान ने दर्जनों गांवों में सड़कों का जाल बिछाकर उन्हें शहर से जोड़ा। अतरौली से गोधा मार्ग का निर्माण और गन्ना मिल उनके कार्यकाल की बड़ी उपलब्धियों में शामिल हैं।
छह प्रधानमंत्रियों से था नाम का रिश्ता
डॉ. अनवार खान एक बार विधायक और दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री रहे। उन्होंने कई चुनाव जरूर हारे, लेकिन उनकी शख्सियत ऐसी थी कि छह प्रधानमंत्री—इंदिरा गांधी, चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, पीवी नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह—उन्हें नाम और चेहरे से बखूबी पहचानते थे।
डॉ. अनवार खान का राजनीतिक सफर
- 1957 में नगर पालिका सभासद के रूप में राजनीतिक सफर की शुरुआत की और लगातार 20 साल तक सभासद रहे।
- 1974 में बीकेडी के टिकट पर पहला विधानसभा चुनाव लड़ा और जनसंघ के कल्याण सिंह से कुछ वोटों से हार गए।
- 1977 में दोबारा बीकेडी से चुनाव लड़ा।
- 1980 में कांग्रेस के टिकट पर तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री कल्याण सिंह को हराकर पहली बार विधायक बने।
- 1980 से 1989 तक यूपी टेक्सटाइल प्रिंटिंग कॉर्पोरेशन के उपाध्यक्ष, यूपी ब्रासवेयर के चेयरमैन, रुड़की यूनिवर्सिटी सीनेट के सदस्य, यूपी 20 सूत्रीय कार्यक्रम के सदस्य, अतरौली मंडी समिति और कोऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन रहे।
- 1985, 1989, 1991, 1993 और 1996 में कांग्रेस से चुनाव लड़े, लेकिन हार मिली।
204 वोट से हारे थे पहला चुनाव
वह बताते थे कि क्षेत्र में मुस्लिम आबादी चार फीसदी थी। 250 बूथों पर वह जीतते थे और 150 पर कल्याण सिंह। लोध बहुल बूथों पर 95 फीसदी और उनके बूथों पर 30 फीसदी मतदान होता था। बूथ कैप्चरिंग भी बड़ी समस्या थी।
उनका कहना था कि 1990 के बाद राजनीति में सांप्रदायिक रंग आ गया। इसके बावजूद 1993 की राम लहर में भी उन्हें 31 हजार वोट मिले थे। पहला चुनाव वह सिर्फ 204 वोटों से हारे थे।
कल्याण सिंह से कभी सीधी बात नहीं हुई
डॉ. अनवार खान बताते थे कि कल्याण सिंह के साथ उनकी कभी सीधी बात नहीं हुई। न उन्होंने कभी कल्याण सिंह से कोई काम कहा और न ही कल्याण सिंह ने उनसे। 2007 में जब कल्याण सिंह की पुत्रवधू प्रेमलता चुनाव लड़ रही थीं, तब कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें चुनाव लड़ने को कहा था। उन्होंने मना करते हुए कहा था, "प्रेमलता मेरी पुत्रवधू जैसी हैं, उनके सामने मैं नहीं लड़ सकता। हां, अगर कल्याण सिंह खुद लड़ें तो मैं जरूर लड़ूंगा।"
वह अक्सर अपनी तकरीर में यह शेर पढ़ते थे—"सितमगर तुझसे उम्मीद-ए-वफा होगी जिसे होगी, हमें तो देखना ये है कि तू जालिम कहां तक है।"
वो किस्सा जब कल्याण सिंह बैठे अनशन पर
एक बार प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और ब्लॉक प्रमुख के चुनाव हो रहे थे। अतरौली ब्लॉक से कल्याण सिंह ने कृपाल सिंह को प्रत्याशी बनाया था, जबकि कांग्रेस के डॉ. अनवार खान विधायक और राज्यमंत्री थे। मुकाबला कांटे का था।
आरोप था कि डॉ. अनवार खान ने रात में कल्याण सिंह पक्ष के तीन बीडीसी सदस्यों को उठवा दिया। इससे कल्याण सिंह के प्रत्याशी की हार तय मानी जा रही थी। इसके बाद कल्याण सिंह अपने समर्थकों के साथ ब्लॉक पर अनशन पर बैठ गए।
इस संकट में राजेंद्र सिंह उनके काम आए। वह विधानसभा सत्र छोड़कर अलीगढ़ आए और डीएम से बात कर कल्याण सिंह पक्ष के सदस्यों को बरामद कराया।
ऐसे ही किस्सों से डॉ. अनवार खान की राजनीतिक जिंदगी भरी रही। उनके निधन से अतरौली ने अपना सबसे बुजुर्ग और सादगी पसंद नेता खो दिया।
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