दिल्ली हादसे के बाद PG पर सवाल, महंगा किराया देने के बावजूद छात्रों की सुरक्षा कितनी पुख्ता?

HIGHLIGHTS
- एसी कमरे के लिए छात्रों को 15 से 20 हजार रुपये तक देने पड़ते हैं।
- अतिरिक्त सुविधाओं के साथ किराया 20 हजार रुपये से ऊपर पहुंच जाता है।
- दिल्ली विश्वविद्यालय के करीब 20 कॉलेज हॉस्टलों में लगभग चार हजार सीटें हैं।
दिल्ली में पढ़ाई के लिए आने वाले छात्रों के लिए कॉलेज-कैंपस के आसपास पीजी अब जरूरत से ज्यादा कमाई का जरिया बनते जा रहे हैं। हॉस्टलों में सीटें सीमित हैं, जबकि बाहर से आने वाले छात्रों की संख्या लगातार अधिक है। ऐसे में छात्रों के सामने पीजी या किराए के कमरे में रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। इसी मजबूरी का फायदा उठाकर पीजी संचालक एक बेड के लिए 12 से 20 हजार रुपये तक किराया वसूल रहे हैं। सुविधाएं अधिक होने पर किराया 25 से 30 हजार रुपये तक पहुंच जाता है। इसके बावजूद इतने महंगे किराए के बदले सुरक्षित छत मिलने की कोई गारंटी नहीं है।
इसी फॉर्मूले पर चल रहा पीजी का कारोबार
दिल्ली में पीजी का कारोबार शायद इसी फॉर्मूले पर चल रहा है- पूरा किराया दो, सुविधाओं की लंबी सूची देखो, लेकिन सुरक्षा के बारे में सवाल मत करो। सत्य निकेतन में रविवार को पांच मंजिला इमारत ढहने की घटना के बाद पीजी में रहने वाले छात्रों की सुरक्षा का मुद्दा एक बार फिर सामने आया है। मलबे में छात्रों के दबे होने की आशंका और हादसे के दौरान कुछ लोगों द्वारा फोन के जरिए मदद मांगने की जानकारी ने चिंता बढ़ा दी है। सवाल यह है कि जिन पीजी में रहने के लिए छात्र हर महीने हजारों रुपये खर्च कर रहे हैं, वहां उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
पीजी का बाजार लगातार बढ़ रहा
नॉर्थ कैंपस से लेकर मुखर्जी नगर और करोल बाग तक छात्रों की इसी मजबूरी के चलते पीजी का बाजार फल-फूल रहा है। एक कमरे में दो-तीन बेड लगाकर हर छात्र से अलग-अलग किराया लिया जाता है। नॉन-एसी कमरे में एक बेड का किराया 10 से 15 हजार रुपये, जबकि एसी कमरे में 15 से 20 हजार रुपये तक है। जिम, वाई-फाई, साइबर कैफे, इंडोर गेम और सिक्योरिटी गार्ड जैसी सुविधाएं मिलने पर किराया 20 हजार रुपये से भी ज्यादा हो जाता है।
कमरे का नहीं, बेड का किराया
यानी यहां किराया कमरे के हिसाब से नहीं, बल्कि बेड के हिसाब से लिया जाता है। सुविधाओं की सूची तो लंबी होती है, लेकिन सुरक्षा की व्यवस्था को लेकर सवाल बना रहता है। भवन की संरचनात्मक मजबूती, फायर सेफ्टी, आपातकालीन निकास, बिजली के तार और एक कमरे में रहने वाले छात्रों की संख्या जैसे मुद्दे अक्सर पीजी के आकर्षक विज्ञापनों के पीछे छिप जाते हैं।
हॉस्टल में चार हजार सीटें, जरूरत 70,000 से ज्यादा की
अकेले दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर पर करीब 70 हजार सीटें हैं। इनमें बड़ी संख्या बाहरी राज्यों से आने वाले छात्रों की है। यूपी, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर से बड़ी संख्या में विद्यार्थी दिल्ली पहुंचते हैं। इसके मुकाबले करीब 20 कॉलेज हॉस्टलों में लगभग चार हजार सीटें ही उपलब्ध हैं। ऐसे में बाकी छात्रों के लिए पीजी ही सहारा बनते हैं। यही कमी पीजी संचालकों के लिए बड़ा बाजार और छात्रों के लिए महंगे किराए की मजबूरी बन गई है।
कैंपस के नजदीक कमरा, तो किराया भी ज्यादा
नॉर्थ कैंपस के आसपास हडसन लेन, विजय नगर, किंग्सवे कैंप, मुखर्जी नगर, क्रिश्चियन कॉलोनी, ईश्वर कॉलोनी, गुप्ता कॉलोनी, जवाहर नगर, चंद्रावल, कमला नगर और नेहरू विहार में बड़ी संख्या में पीजी मौजूद हैं। दक्षिण दिल्ली में कटवरिया सराय, कालू सराय, आईएनए, गौतम नगर, मुनिरका, नेब सराय और जामिया-ओखला क्षेत्र छात्रों के प्रमुख ठिकाने हैं। इसके अलावा लक्ष्मी नगर, प्रीत विहार और करोल बाग में भी बड़ी संख्या में छात्र रहते हैं।
कैंपस से दूरी बढ़ने पर किराया कुछ कम हो सकता है, लेकिन इसके साथ आने-जाने का खर्च और समय बढ़ जाता है। यही वजह है कि छात्र महंगे पीजी में रहने के लिए मजबूर होते हैं। पीजी संचालकों के लिए छात्रों की यह मजबूरी लगातार कमाई का जरिया बनी हुई है।
राजेंद्र नगर हादसे के बाद सरकार हरकत में आई, लेकिन जमीन पर स्थिति जस की तस
जुलाई 2024 में राजेंद्र नगर कोचिंग बेसमेंट हादसे के बाद पीजी, कोचिंग संस्थानों और बेसमेंट की सुरक्षा व्यवस्था सुधारने को लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार ने कई घोषणाएं की थीं। इसके बावजूद दो साल बाद भी पीजी के लिए अलग और एकीकृत फायर एवं स्ट्रक्चरल सेफ्टी कोड लागू नहीं हो सका है। पीजी की वैधता और सुरक्षा अलग-अलग भवन उपनियमों, मास्टर प्लान, अग्निशमन नियमों और स्थानीय निकायों की मंजूरियों में बंटी हुई है। डीडीए अभी यूबीबीएल-2016 को भवन अनुमोदन का आधार बता रहा है, जबकि दिल्ली फायर सेवा फायर सेफ्टी नियम, 2010 और उनके 2025 के संशोधनों के तहत काम कर रही है।
हादसे के बाद सवाल, पीजी की सुरक्षा जांच की जिम्मेदारी किसकी?
सत्य निकेतन की घटना ने दिल्ली के उन सैकड़ों पीजी और किराए के कमरों की निगरानी को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं, जहां छात्रों से हर महीने हजारों रुपये लिए जा रहे हैं। क्या इन इमारतों की नियमित जांच की जाती है? क्या उनकी संरचनात्मक मजबूती का रिकॉर्ड देखा जाता है? क्या एक कमरे में तय क्षमता से अधिक छात्रों को रखने पर कार्रवाई होती है? फायर सेफ्टी और आपातकालीन निकास की व्यवस्था मौजूद है या नहीं? आपदा की स्थिति में छात्र सुरक्षित बाहर निकल सकते हैं या नहीं? इन सभी सवालों का जवाब आखिर कौन देगा?
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