ज्ञानेश कुमार के खिलाफ पूर्व नौकरशाहों का मोर्चा, इस्तीफे की मांग के साथ जारी किया 'जनता का महाभियोग'

HIGHLIGHTS
- पूर्व अधिकारियों और अधिकार कार्यकर्ताओं ने चार पन्नों का नोटिस जारी किया।
- नोटिस में चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर छह आरोप लगाए गए।
- प्रतिनिधिमंडल को चुनाव आयोग कार्यालय तक पहुंचने से रोकने का आरोप।
नई दिल्ली। नेताओं और राजनीतिक दलों के बाद अब पूर्व नौकरशाहों और अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आवाज उठाई है। पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लई, दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, कार्यकर्ता योगेंद्र यादव समेत पूर्व नौकरशाहों और अधिकार कार्यकर्ताओं ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। समूह की ओर से उनके खिलाफ चार पन्नों का जनता का महाभियोग नोटिस जारी किया गया है। इसमें चुनाव आयोग के कामकाज और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर छह आरोप लगाए गए हैं। समूह का कहना है कि ये आरोप केवल राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नागरिकों और नागरिक समाज की चिंताओं से जुड़े हैं।
प्रतिनिधिमंडल को चुनाव आयोग कार्यालय जाने से क्यों रोका गया?
समूह के सदस्यों के अनुसार, वे नोटिस सौंपने के लिए चुनाव आयोग के कार्यालय जा रहे थे, लेकिन उन्हें वहां पहुंचने से रोक दिया गया। अधिकार कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग मुख्यालय की ओर जाने वाली सभी सड़कों पर बैरिकेड लगाए गए थे। उन्होंने कहा कि अधिकारियों को पहले से जानकारी थी कि पूर्व नौकरशाहों का प्रतिनिधिमंडल वहां पहुंचने वाला है।
अंजलि भारद्वाज के मुताबिक, इस तरह की रोक कानून और संविधान का उल्लंघन है। नजीब जंग ने कहा कि पूर्व अधिकारियों ने अपने पूरे करियर में संविधान की रक्षा करने की शपथ ली है।
सीईसी ज्ञानेश कुमार पर लगाए गए कौन से आरोप?
नोटिस में मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर चुनाव आयोग के सामूहिक कामकाज को कमजोर करने, वैधानिक फॉर्म-6 में बदलाव को मंजूरी देने, ईसीआईनेट के जरिए मतदाता सूची से जुड़े काम को केंद्रीकृत करने, एसआईआर के माध्यम से बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने, राजनीतिक निष्पक्षता से समझौता करने और वैधानिक जिम्मेदारियों के बार-बार उल्लंघन के आरोप लगाए गए हैं।
नोटिस में दावा किया गया है कि एसआईआर जैसे बड़े फैसलों को लेकर आयोग के भीतर पर्याप्त चर्चा, सलाह-मशविरा और रिकॉर्डेड कार्यवाही नहीं हुई। इसमें दो अन्य निर्वाचन आयुक्तों की कथित आपत्तियों का भी जिक्र किया गया है।
फॉर्म-6 और ईसीआईनेट को लेकर क्या सवाल उठाए गए?
नोटिस में आरोप लगाया गया है कि फॉर्म-6 के बदले हुए स्वरूप का इस्तेमाल किया गया, जबकि इसकी वैधता को लेकर आंतरिक स्तर पर आपत्तियां थीं। इसमें यह सवाल भी उठाया गया कि पहले से मतदाता सूची में शामिल रहे और कथित तौर पर गलत तरीके से बाहर किए गए लोगों से दोबारा पहली बार नाम जुड़वाने जैसी घोषणा क्यों कराई गई।
ईसीआईनेट को लेकर आरोप लगाया गया है कि इससे मतदाता पंजीकरण अधिकारियों के वैधानिक अधिकार प्रभावित हुए। ये अधिकारी मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और गलतियों को ठीक करने के लिए जिम्मेदार होते हैं।
एसआईआर को लेकर पूर्व अधिकारियों और कार्यकर्ताओं की क्या आपत्ति है?
नोटिस में आरोप लगाया गया है कि एसआईआर को पर्याप्त तैयारी और प्रशिक्षण के बिना लागू किया गया। गलत तरीके से मतदाता सूची से बाहर किए गए लोगों के नाम तेजी से वापस जोड़ने के लिए प्रभावी व्यवस्था भी पर्याप्त नहीं थी।
समूह का कहना है कि इसका असर महिलाओं, गरीबों, प्रवासियों, अल्पसंख्यकों और बुजुर्गों पर ज्यादा पड़ा। जीके पिल्लई ने कहा कि नागरिकों पर अपनी नागरिकता साबित करने का बोझ डालना गलत दिशा है। उन्होंने सवाल किया कि संभावित अवैध नागरिकों की तलाश के लिए बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों से अपनी पात्रता साबित करने के लिए क्यों कहा जा रहा है।
क्या 'जनता का महाभियोग' कानूनी कार्रवाई है?
पूर्व खुफिया ब्यूरो विशेष निदेशक यशोवर्धन आजाद ने माना कि जनता के महाभियोग की इस पहल को कानूनी मान्यता हासिल नहीं है। हालांकि, उन्होंने कहा कि इससे यह संदेश जाता है कि ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग केवल विपक्षी दलों तक सीमित नहीं है, बल्कि नागरिक समाज भी इसे उठा रहा है।
पूर्व राजनयिक शिव शंकर मुखर्जी ने कहा कि भारत के चुनावों की सफलता देश की वैश्विक छवि की बड़ी ताकत रही है और मौजूदा विवाद ने लोकतांत्रिक छवि को नुकसान पहुंचाया है। योगेंद्र यादव ने इसे भारतीय चुनावी लोकतंत्र के सबसे अंधकारपूर्ण दौर में से एक बताया।
यह पूरा मामला एसआईआर, मतदाता नामों के कथित गलत तरीके से हटाए जाने, नामांकन प्रक्रिया में बदलाव और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर चल रहे विवाद के बीच सामने आया है।
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