चीन से मुकाबले के लिए ITBP की नई तैयारी, हर बॉर्डर बटालियन में होंगे शौर्य कमांडो

HIGHLIGHTS
- आईटीबीपी को ड्रोन युद्ध क्षमता बढ़ाने के लिए 400 करोड़ रुपये की फंडिंग मिली है।
- गृह मंत्रालय ने 4,000 करोड़ रुपये की आधुनिकीकरण योजना को सैद्धांतिक मंजूरी दी है।
- नए स्ट्राइक कोर्स के तहत 2027 के अंत तक पूरी फोर्स को प्रशिक्षण देने का लक्ष्य है।
भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के प्रमुख शत्रुजीत सिंह कपूर ने गुरुवार को बताया कि बल ने ‘शौर्य कमांडो’ नाम से एक नई लड़ाकू इकाई तैयार की है। इन कमांडो ने अरुणाचल प्रदेश में चीनी सेना (PLA) के साथ विभिन्न स्थानों पर जारी गतिरोध के दौरान अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया है।
कपूर के मुताबिक, हर बॉर्डर बटालियन में इन कमांडो की तैनाती की जाएगी। चीन के साथ 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर अपनी युद्ध-तैयारी को मजबूत करने के लिए आईटीबीपी लगातार कदम उठा रही है।
आईटीबीपी प्रमुख ने क्या कहा?
आईटीबीपी प्रमुख का यह बयान ऐसे समय आया है, जब बल अपने आधुनिकीकरण अभियान को गति दे रहा है। इस अभियान के तहत नई युद्ध तकनीकों को अपनाने और विशेष प्रशिक्षण पर जोर दिया जा रहा है।
24 अक्टूबर को बल के 65वें स्थापना दिवस से पहले राजस्थान के अलवर स्थित आईटीबीपी बेस पर जवानों को संबोधित करते हुए कपूर ने कहा कि चीन जैसी प्रमुख चुनौती का सामना करने के लिए युद्ध के पारंपरिक तरीके अब पर्याप्त नहीं हैं।
नया स्ट्राइक कोर्स भी तैयार
आईटीबीपी ने अपनी सीमा-रक्षक बटालियनों में ड्रोन प्लाटून गठित किए हैं। साथ ही, जवानों को ड्रोन संचालन और इस तकनीक के विकास के लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
कपूर ने बताया कि बल को सरकार से 400 करोड़ रुपये की फंडिंग मिली है। इसमें से 70 प्रतिशत राशि ड्रोन युद्ध क्षमताओं को मजबूत करने पर खर्च की जाएगी।
गृह मंत्रालय ने 4,000 करोड़ रुपये की आधुनिकीकरण योजना को सैद्धांतिक मंजूरी दी है। इसमें ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम के लिए 1,000 करोड़ रुपये का प्रावधान शामिल है।
आईटीबीपी ने एक नया स्ट्राइक कोर्स भी तैयार किया है। इसका उद्देश्य जवानों को जून 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प जैसी युद्ध परिस्थितियों के लिए तैयार करना है। कपूर के अनुसार, 2027 के अंत तक पूरी फोर्स को यह प्रशिक्षण दे दिया जाएगा।
पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ हुई हिंसक झड़प में 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे। बाद में चीन ने भी अपने चार सैनिकों की मौत की बात स्वीकार की थी।
युद्ध प्रशिक्षण और तकनीक के साथ-साथ आईटीबीपी अग्रिम क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को भी मजबूत कर रही है। कपूर ने बताया कि सीमावर्ती इलाकों में जमीन के नीचे आश्रय स्थल बनाए जा रहे हैं, ताकि संघर्ष की स्थिति में जोखिम कम किया जा सके। उनके मुताबिक, जमीन के ऊपर बनी संरचनाएं युद्ध के दौरान आसानी से निशाना बन सकती हैं।
चीन का मुकाबला करने की तैयारी
बल ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात जवानों के लिए सुविधाओं में भी सुधार कर रहा है। इसके तहत बैरकों को इंसुलेट करना, सोलर वॉटर हीटर लगाना और दूर-दराज की चौकियों पर बिजली की उपलब्धता बनाए रखने के लिए जनरेटर सेट उपलब्ध कराना शामिल है।
इसके अलावा, अत्यधिक ठंड में वाहनों को स्टार्ट करने में मदद के लिए कोल्ड-स्टार्ट किट भी शामिल की गई हैं। कपूर ने कहा कि ये सभी कदम आईटीबीपी को एक विशेष उच्च-ऊंचाई वाले पर्वतीय युद्ध बल के रूप में विकसित करने की व्यापक योजना का हिस्सा हैं, ताकि वह चीन सीमा पर उभरती सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर सके।
कांग्रेस ने साधा निशाना
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने केंद्र सरकार पर चीन के सामने झुकने और अरुणाचल प्रदेश में सीमा तनाव को लेकर उठाई गई चिंताओं का समाधान नहीं करने का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि इस क्षेत्र में भारत की पहुंच कुछ पेट्रोलिंग पॉइंट्स तक सीमित हो गई है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में रमेश ने भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के महानिदेशक का हवाला दिया। उन्होंने अरुणाचल प्रदेश में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के साथ हालिया झड़पों के दौरान आईटीबीपी के प्रदर्शन की सराहना का उल्लेख किया।
रमेश ने इन घटनाओं पर सरकार की चुप्पी को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री और उनके प्रशासन की ओर से इस मामले पर सार्वजनिक रूप से कोई बयान नहीं दिया गया है।
कांग्रेस नेता ने अरुणाचल प्रदेश में स्थानों के नाम बदलने की चीन की कोशिशों और वहां 60,000 मेगावाट का बांध बनाए जाने की खबरों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, “स्थानीय लोगों ने बताया है कि लद्दाख की तरह ही हमारे कई पेट्रोलिंग पॉइंट एक बार फिर हमारे नियंत्रण से बाहर हो गए हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि चीन लगातार अरुणाचल प्रदेश के कस्बों के नाम बदल रहा है और 60,000 मेगावाट का बांध बना रहा है, जो भारत की पर्यावरणीय और जल सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है।
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