सूर्य की रोशनी से साफ होगा प्रदूषित पानी, CCSU और गुरुकुल कांगड़ी के वैज्ञानिकों ने विकसित की नई नैनो तकनीक

HIGHLIGHTS
- CCSU और गुरुकुल कांगड़ी के वैज्ञानिकों ने जल शोधन के लिए नई नैनो तकनीक विकसित की।
- सेरियम मिश्रित टिन ऑक्साइड नैनोकण सूर्य के प्रकाश से प्रदूषकों को खत्म करने में सक्षम पाए गए।
- तकनीक से औद्योगिक रंगों और एंटीबायोटिक अवशेषों के उपचार की उम्मीद जगी है।
मेरठ। जल प्रदूषण की बढ़ती समस्या के बीच चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (सीसीएसयू) और गुरुकुल कांगड़ी (डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय), हरिद्वार के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक नई नैनो तकनीक विकसित की है। यह तकनीक सूर्य के प्रकाश की मदद से प्रदूषित पानी को शुद्ध करने में सक्षम है।
इस शोध के तहत वैज्ञानिकों ने सेरियम मिश्रित टिन ऑक्साइड (SnO-2) नैनोकण तैयार किए हैं, जो औद्योगिक रंगों और एंटीबायोटिक अवशेषों को प्रभावी तरीके से खत्म करने में सक्षम पाए गए हैं।
सूर्य की रोशनी से पानी शुद्ध करने वाली तकनीक विकसित
सीसीएसयू के प्रो. संजीव कुमार और गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के प्रो. महेंद्र पाल ने मिलकर यह शोध किया है। वैज्ञानिकों ने जल तापीय अवक्षेपण तकनीक के माध्यम से अलग-अलग सांद्रता वाले सेरियम मिश्रित टिन ऑक्साइड नैनोकण तैयार किए।
इन नैनोकणों को 600 डिग्री सेल्सियस तापमान पर संसाधित किया गया। अध्ययन में पांच प्रतिशत सेरियम मिश्रण वाला नमूना सबसे अधिक प्रभावी पाया गया।
इस प्रकाश उत्प्रेरक ने प्राकृतिक सूर्य के प्रकाश में कई प्रदूषकों को प्रभावी रूप से नष्ट किया। इसमें क्रिस्टल वायलेट रंग का 95.36 प्रतिशत, मेथिलीन ब्लू का 93.39 प्रतिशत, मेथिल ऑरेंज का 86.66 प्रतिशत और सिप्रोफ्लॉक्सासिन एंटीबायोटिक का 79 प्रतिशत तक अपघटन किया गया।
सेरियम मिश्रण से बढ़ी प्रकाश उत्प्रेरक क्षमता
शोधकर्ताओं के अनुसार, सेरियम को मिलाने से टिन ऑक्साइड का ऊर्जा अंतराल 3.50 इलेक्ट्रॉन वोल्ट से घटकर लगभग 3.35 इलेक्ट्रॉन वोल्ट रह गया। इससे यह केवल पराबैंगनी किरणों पर निर्भर नहीं रहा, बल्कि सूर्य के दृश्य प्रकाश का भी प्रभावी इस्तेमाल करने लगा।
इसके अलावा ऑक्सीजन रिक्तियों और सेरियम के ऑक्सीकरण-अपचयन चक्र के कारण सक्रिय ऑक्सीजन कणों का निर्माण बढ़ा, जिससे प्रदूषकों का तेजी से विघटन संभव हो सका।
शोध की खासियत
इस शोध की खास बात यह है कि वैज्ञानिकों ने केवल एक प्रदूषक पर अध्ययन नहीं किया, बल्कि तीन औद्योगिक रंगों और एक प्रमुख एंटीबायोटिक के एक साथ अपघटन का परीक्षण किया।
वैज्ञानिकों ने अलग-अलग सेरियम सांद्रताओं और 600 डिग्री सेल्सियस तापमान पर तापीय संसाधन के प्रभाव का भी अध्ययन किया। इससे संरचनात्मक बदलाव, प्रकाशीय गुणों और प्रकाश उत्प्रेरक क्षमता के बीच संबंध स्पष्ट हुआ।
सैद्धांतिक गणनाओं से भी किया गया सत्यापन
शोध को सिर्फ प्रयोगशाला परीक्षण तक सीमित नहीं रखा गया। वैज्ञानिकों ने घनत्व फलन सिद्धांत (DFT) आधारित सैद्धांतिक गणनाओं के माध्यम से भी यह प्रमाणित किया कि सेरियम मिश्रण से इलेक्ट्रॉनिक संरचना, ऊर्जा अंतराल और इलेक्ट्रॉन घनत्व में होने वाले बदलाव ही इस तकनीक की बेहतर प्रकाश उत्प्रेरक क्षमता के मुख्य कारण हैं।
जल शोधन में उपयोगी साबित हो सकती है तकनीक
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस तकनीक में महंगे कृत्रिम प्रकाश स्रोतों की जरूरत नहीं होती। प्राकृतिक सूर्य के प्रकाश की मदद से कम लागत में जल शोधन किया जा सकता है।
भविष्य में वस्त्र, औषधि, रसायन और रंग उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट जल के उपचार में यह तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। बड़े स्तर पर इसके इस्तेमाल से स्वच्छ जल उपलब्ध कराने, पर्यावरण संरक्षण और एंटीबायोटिक प्रदूषण को नियंत्रित करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
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