नवी पिल्लई को मिला 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार, अंतरराष्ट्रीय कानून में रहा अहम योगदान

HIGHLIGHTS
- नवी पिल्लई का जन्म 23 सितंबर 1941 को डरबन, दक्षिण अफ्रीका में हुआ था।
- उनके दादा-दादी 1890 के दशक में भारत से दक्षिण अफ्रीका गए थे।
- वह वर्ष 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त रहीं।
दक्षिण अफ्रीका की प्रसिद्ध न्यायविद् नवनीनम 'नवी' पिल्लई को वर्ष 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। पुरस्कार की घोषणा नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में की गई। उन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून और शांति को बढ़ावा देने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए यह सम्मान दिया गया है।
नवी पिल्लई ने अपने लंबे कानूनी करियर में अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे और प्रभाव को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। रवांडा के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण में न्यायाधीश के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने ऐसे कानूनी सिद्धांतों को स्थापित करने में योगदान दिया, जिनके तहत दुष्कर्म और यौन हिंसा को मानवता के खिलाफ अपराध तथा नरसंहार का हिस्सा माना जा सकता है।
इसी मामले में उनके योगदान से एक और महत्वपूर्ण कानूनी उपलब्धि हासिल हुई। पहली बार केवल नफरती प्रचार के जरिए नरसंहार भड़काने के आधार पर किसी आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाया गया। अपनी निष्पक्षता, विशेषज्ञता और दृढ़ संकल्प के जरिए उन्होंने यह दिखाया कि कानूनी व्यवस्था युद्ध और हिंसा से जुड़े अपराधों को रोकने में प्रभावी भूमिका निभा सकती है। नवी पिल्लई को वर्तमान दौर की प्रमुख और सम्मानित अंतरराष्ट्रीय कानूनविदों में गिना जाता है।
क्यों मिला नोबेल शांति पुरस्कार?
नवी पिल्लई को अंतरराष्ट्रीय कानून और शांति को प्रोत्साहित करने के लिए किए गए असाधारण प्रयासों के चलते वर्ष 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया है।
भारतीय तमिल मूल की हैं नवी पिल्लई
नवी पिल्लई का जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में एक गरीब परिवार में हुआ था। वह भारतीय तमिल मूल की हैं। उनके दादा-दादी 1890 के दशक में भारत से दक्षिण अफ्रीका गए थे।
संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय न्याय संस्थाओं में निभाई अहम भूमिका
नवी पिल्लई वर्ष 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त रह चुकी हैं। उन्होंने रवांडा के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण (ICTR) की अध्यक्ष और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) की न्यायाधीश के रूप में भी सेवाएं दी हैं।
वह दक्षिण अफ्रीका के उच्च न्यायालय में नियुक्त होने वाली पहली गैर-श्वेत महिला न्यायाधीश थीं। इसके अलावा, हार्वर्ड लॉ स्कूल से कानून में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल करने वाली वह पहली दक्षिण अफ्रीकी नागरिक भी हैं।
अकायेसु मामले में रहा ऐतिहासिक योगदान
रवांडा न्यायाधिकरण में नवी पिल्लई ने 'अकायेसु मामले' में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस मामले के जरिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक कानून के इतिहास में पहली बार बलात्कार और यौन हिंसा को नरसंहार तथा युद्ध अपराध के रूप में मान्यता दी गई।
फलस्तीनी क्षेत्रों में मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच से जुड़ी हैं
नवी पिल्लई फिलहाल फलस्तीनी क्षेत्रों में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच के लिए गठित संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र जांच आयोग की अध्यक्षता कर रही हैं।






























Reader comments
No comments yet
Be the first to share your perspective on this story.