सुप्रीम कोर्ट का बड़ा स्पष्टीकरण, कहा- संशोधित फॉर्म 6 को न मंजूरी दी, न इस पर कोई फैसला

HIGHLIGHTS
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संशोधित फॉर्म 6 पर कोई न्यायिक फैसला नहीं हुआ।
- नए फॉर्म में आवेदकों को पिछले SIR में अपनी या माता-पिता की भागीदारी बतानी होती है।
- 26 सितंबर की चुनाव आयोग की प्रेस विज्ञप्ति के बाद विवाद बढ़ा।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को साफ किया कि नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए चुनाव आयोग के संशोधित फॉर्म 6 को लेकर उसने न तो कोई फैसला सुनाया है और न ही उसे मंजूरी दी है। अदालत ने कहा कि बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से संबंधित मामले में फैसला देते समय संशोधित फॉर्म उसके सामने मौजूद नहीं था।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और फॉर्म 6 में किए गए बदलावों को चुनौती देने वाली नई याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसी दौरान अदालत ने यह स्पष्टीकरण दिया।
फॉर्म 6 पर सुप्रीम कोर्ट के रुख को लेकर चुनाव आयोग का अलग दावा
संशोधित फॉर्म में नए मतदाता के तौर पर पंजीकरण कराने वाले आवेदकों को यह जानकारी देनी होती है कि वे या उनके माता-पिता पिछले SIR में शामिल थे या नहीं।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर को स्पष्ट किया था कि उसने संशोधित फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग का दावा था कि संशोधित घोषणा-पत्र को शीर्ष अदालत की स्वीकृति प्राप्त है।
इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत ने नए फॉर्म 6 पर कोई फैसला नहीं दिया है। बिहार SIR मामले में निर्णय सुनाए जाने के समय संशोधित फॉर्म अस्तित्व में ही नहीं था। उन्होंने स्पष्ट किया, "नए फॉर्म 6 पर कोई न्यायिक फैसला नहीं हुआ है।"
अदालत ने यह भी कहा कि उसकी पिछली मौखिक टिप्पणियों को संशोधित घोषणा-पत्र की मंजूरी या अस्वीकृति के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने मीडिया रिपोर्टिंग में सावधानी बरतने की बात कहते हुए कहा, "कृपया खबरों के लिए चुनिंदा शब्द न उठाएं।"
26 सितंबर की प्रेस विज्ञप्ति के बाद बढ़ा विवाद
संशोधित फॉर्म 6 को लेकर विवाद उस समय बढ़ा, जब चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की। इसमें संकेत दिया गया था कि बिहार में SIR से जुड़े मई 2026 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित घोषणा-पत्र को बरकरार रखा था।
हालांकि, संशोधित घोषणा-पत्र अदालत के फैसले के बाद लागू किया गया था। इस वजह से बिहार SIR मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को इसके प्रावधानों की जांच करने का मौका नहीं मिला था।
पुराने फॉर्म 6 में नहीं थी यह शर्त
संशोधित फॉर्म 6 के तहत नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए आवेदन करने वालों को बताना अनिवार्य है कि वे या उनके माता-पिता पिछले SIR में शामिल थे या नहीं। दूसरे राज्यों में SIR के दौरान इस्तेमाल किए गए फॉर्म 6 के पुराने प्रारूप में ऐसी कोई शर्त नहीं थी।
इस बदलाव को लेकर चुनाव आयोग के अंदर निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, आयोग के दो चुनाव आयुक्तों ने कथित तौर पर इस आधार पर आपत्ति जताई थी कि केंद्र सरकार की ओर से मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 में संशोधन किए बिना घोषणा-पत्र में बदलाव नहीं किया जा सकता।
राहुल गांधी ने लगाए आरोप, भाजपा ने किया खारिज
संशोधित फॉर्म को लेकर राजनीतिक विवाद भी सामने आया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि फॉर्म में एकतरफा और अवैध तरीके से बदलाव किया गया, ताकि भाजपा को फायदा मिल सके।
भाजपा ने इन आरोपों को खारिज कर दिया। पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने न तो फॉर्म को अवैध घोषित किया है और न ही उसे खारिज किया है। उन्होंने इस दावे से भी असहमति जताई कि शीर्ष अदालत ने फॉर्म में किए गए बदलाव को अवैध ठहराया है।
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