रैन बसेरों की स्थिति !

उत्तर प्रदेश शासन के स्थानीय निकाय निदेशक अनुज कुमार झा ने सभी जिला अधिकारियों को रैन बसेरों की सुविधाओं पर नजर रखने के लिए वहां सीसीटीवी कैमरे लगाने के निर्देश दिये हैं। सभी रैन बसेरों में नोडल अधिकारी नामित करने तथा स्थानीय निकायों द्वारा संचालित रैन बसेरे में देखभाल के लिए एक व्यक्ति की नियुक्ति का निर्देश भी दिया। रैन बसेरों में साफ कम्बल, बिस्तर, गर्म पानी, शौचालय की सफाई व्यवस्था पर ध्यान देने की ताकीद भी दी गई।
इस विशाल देश, प्रदेश में करोडों लोग बिना छत के रात गुज़ारते हैं। रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, पुलों व ओवर ब्रिज के नीचे, कभी कभी बड़े वृक्षों के तले हाड़ कंपाती ठिठुरन के दौरान इन्हें देखा जा सकता है। बहुत पहले से इन निराश्रित लोगों के लिए रैन बसेरों में ठहरने या अलाव तापकर रात बिताने की परम्परा है। यें रैनबसेरे और अलाव हमारी (देश की) संपन्नता और विपन्नता के पैमाने हैं। जिस देश में करोड़ों लोग रात्रि में अलाव ताप कर रात काटते हो, उसकी जीडीपी कितनी बढ़ जाए, अर्थव्यवस्था बढ़कर किसी भी स्तर पर पहुंच जाए, अलाव के इर्दगिर्द बैठने वालों को इससे क्या हासिल होता है? खैर यह अलग सवाल है।
निराश्रितों के लिए रैन बसेरों की व्यवस्था है तो उनका प्रबंध व देखभाल भी ठीक होनी चाहिए। मुजफ्फरनगर की ही बात करते हैं। गतवर्ष यानी 6 दिसंबर,2024 को जिला अधिकारी उमेश मिश्र ने रेलवे स्टेशन के समीप स्थित रैन बसेरे का देर रात औचक निरीक्षण किया। कम्बल, बिस्तर, शौचालय यानी सभी व्यवस्थाएं असंतोषजनक मिलीं। रैन बसेरों को पालिका व आदर्श सेवा समिति मिलकर चलाते हैं। जिला अधिकारी महोदय की प्रताड़ना के बाद एकदूसरे पर जिम्मेदारी डालने की कोशिश शुरु हो गई।
अभी 9 दिसंबर 2025 को जिला अधिकारी महोदय ने देर रात अपर जिला आधकारी वित्त एवं राजस्व राजेन्द्र कुमार, उप जिला अधिकारी प्रवीण द्विवेदी, अधिशासी अधिकारी प्रज्ञा सिंह तथा अन्य सरकारी अमले के साथ रेलवे स्टेशन मार्ग, साईं मंदिर, जानसठ फ्लाई ओवर, भोपा फ्लाई ओवर स्थित रैन बसेरों व आश्रय स्थलों का औचक निरीक्षण कर व्यवस्थाओं को परखा और व्यवस्था सुधार के निर्देश दिये।
गत वर्ष अर्थात वर्ष 2024 के शीतकाल में मुजफ्फरनगर पालिका परिषद की अधिशाषी अधिकारी डॉ. प्रज्ञा सिंह ने नगर में जलने वाले अलावों का आक्समिक निरीक्षण किया। पाया कि शामली रोड, अस्पताल तिराहे व शिवचौक पर लगे अलावों में लकड़ियों का अभाव है, जबकि नगरपालिका जलावन के लिए अच्छा बजट देती है। पालिका के एक जिम्मेदार अधिकारी को इस कमी के लिए दोषी पाया गया था।
केन्द्र सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना के अधीन 4 करोड़ मकान उपलब्ध कराये हैं। ये आवास वे लोग ही ले पाये हैं जो किराये के मकानों में गुज़र कर रहे थे। फिर भी यह बड़ी उपलब्धि है। करोड़ों निराश्रितों की समस्या जस की तस है। केन्द्र, राज्य सरकारों व सामाजिक संगठनों को मिलकर समाधान करना होगा।
देश भर में, चाहे राजधानी हो, महानगर हो या बड़े शहर हों, नयी बस्तियां, नयी कॉलोनियां बसाई जा रही हैं। मुजफ्फरनगर में भोपा रोड के समीप तीन ग्रामों के किसानों की जमीन अधिग्रहित कर नयी आवासीय कॉलोनी बनाने पर जद्दोजहद जारी है तो राष्ट्रीय राजमार्ग 58 पर मूलचन्द रिसोर्ट के समीप 100 एकड़ में आलीशान कॉलोनी बनने जा रही है। खेद है कि न तो आवास विकास परिषद, न ही रियल एस्टेट कंपनियां गरीबों के आवास के लिए कुछ नहीं सोचतीं। सरकार को चाहिए कि वह नियम बनाये कि नयी कॉलोनियों में जहां रेन वाटर हार्वेस्टिंग पिट बनाना अनिवार्य हो, वहीं प्रत्येक नयी कॉलोनी में अनिवार्य रूप से रैन बसेरा की भी व्यवस्था हों। ऊंची अट्टालिकाओं, और करोड़ों के विला में रहने वालों को यह मखमल में टाट का पैबन्द जैसा लगेगा किन्तु जब समानता, भाई चारा का दावा किया जाता हो तो ऐसा होना ही चाहिए और जो रैन बसेरे चालू हैं उन्हें इसानों के रहने लायक बनाया जाना चाहिये।
गोविंद वर्मा (संपादक 'देहात')
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