किसान दिवस और बलिदान दिवस !

23 दिसंबर देश की दो महान् विभूतियों को स्मरण कर उनके जीवन दर्शन पर मनन करने और इन महा पुरुषों के आदर्शों को अपनाने का दिन था। कृषि प्रधान देश में कृषि एवं किसान की उन्नति का मार्ग दिखाने वाले चौ. चरण सिंह का 123वां जन्मदिन पूरे भारत में किसान दिवस के रूप में मनाया गया। मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, बड़ौत, लखनऊ आदि सैकड़ों स्थानों तथा हजारों स्कूल, कॉलेज व सामाजिक एवं राजनीतिक संगठनों ने चौधरी साहब के आदर्श व्यक्तित्व तथा राष्ट्र के प्रति उनकी सेवाओं के लिए उन्हें आदर पूर्वक याद कर श्रद्धांजलि अर्पित की।
चकबन्दी, भूमि प्रबंधन, राजस्व तथा प्रशासनिक नियमों को जनोन्मुखी बनाकर उन्होंने खेती व ग्रामोद्योगों का आदर्श मॉडल तैयार किया। कांग्रेस को छोड़ कर प्रत्येक राजनीतिक दल चौधरी साहब के आदर्शों एवं उनके मार्ग को कृषि व किसान हितकारी मानता है, यद्यपि उनके राजनीतिक जीवन का सर्वाधिक समय कांग्रेस में ही बीता। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चौ. चरणसिंह को 'भारतरत्न' से विभूषित कर दशकों से चली आ रही उपेक्षा को समाप्त किया। 123वें जन्मदिन पर 'देहात' का शत-शत नमन।
हिन्दुओं की घर वापसी के पुरोधा और वैदिक सनातन संस्कृति के महान् संरक्षक स्वामी श्रद्धानन्द का बलिदान भी 23 दिसंबर, सन् 1926 को दिल्ली में हुआ था। जब दो राष्ट्रों के भ्रामक आधार पर विघटनकारी अंग्रेज गर्वनर, मुस्लिम कट्टरपंथी लीगी नेता, कांग्रेस के कथित सेक्युलरवादी देश के बंटवारे की भूमिका तैयार करने में जुटे थे, तब स्वामी श्रद्धानन्द ने हिन्दू से मुसलमान बने लोगों को शुद्धि आन्दोलन चलाकर 5 लाख लोगों को पुनः वैदिक धर्म में प्रविष्ट करा पूरे भारत में तहलका फैला दिया था। कट्टरलीगी, गांधी व नेहरू आदि आंदोलन का विरोध कर रहे थे। स्वामी जी ने डंके की चोट पर कहा- हिन्दू से मुस्लिम बने हिन्दुओं की घर वापसी जायज़ है।
दिल्ली की जामा मस्जिद में कट्टरपंथियों को शास्त्रार्थ करने की चुनौती दी। पहले दिन के शास्त्रार्थ में कट्टरपंथी मौलाना हार गये। दूसरे दिन के शास्त्रार्थ में भी मौलाना मौलवी धर्मांतरण को शास्त्रसम्मत सिद्ध न कर पाये। कट्टरपंथियों में इस पराजय से स्वामी जी के प्रति घृणा व शत्रुभाव पैदा हुआ। अब्दुल रशीद नामक एक जुनूनी युवक को तैयार किया गया। उस दिन स्वामी जी बीमार थे। 23 दिसंबर 1926 की घटना स्वामी श्रद्धानन्द नयाबांस मौहल्ला स्थित आवास में बैठे थे। अब्दुल रशीद वहां पहुंचा। पिस्तौल चादर में छिपाई हुई थी। पानी पीने का बहाना कर सेवादार को भीतर भेजा और एक के बाद एक तीन गोलियां चलाकर स्वामी जी की हत्या कर दी।
मोहनदास करमचंद गांधी तब गोहाटी में थे। खबर सुनकर बोले- 'यह तो हो ना ही था।' दिल्ली लौटे तो कहा कि मैं प्रैक्टिस करता होता तो अब्दुल रशीद की और से उसका मुकदमा लड़ता। बाद में गांधी जी ने रशीद के बचाव में दिल्ली के प्रमुख फौजदारी वकील आसिफ अली को खड़ा किया किन्तु रशिद हत्या के अपराध से बच नहीं सका।
आतंक और डर से हिन्दुओं का धर्मांतरण सदियों पुराना कलंक है। स्वामी श्रद्धानन्द के शुद्धि आन्दोलन को बघरा आश्रम के स्वामी यशवीर आगे बढ़ा रहे हैं, जिनको राष्ट्रवादियों का हार्दिक समर्थन मिलना चाहिए। स्वामी श्रद्धानन्द के बलिदान दिवस पर हमारी स्वामी जी को हार्दिक श्रद्धांजलि।
गोविंद वर्मा (संपादक 'देहात')
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