प्रदूषण न फैले, कारखाने भी चलें !

भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) के राष्ट्रीय प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक ने पेपर व स्टील मिलों से प्रदूषण फैलने का मुद्दा जोरशोर से उठाया। अन्य शहरों से लाये गए कचरे के ट्रकों को रोका गया। भोपा रोड पर जटमुझेड़ा तक पेपर मिलों से निकली गन्दगी को सड़क किनारे डालने के विरोध में धरना भी दिया गया। मंसूरपुर क्षेत्र में कचरे का एक ट्राला व 2 ट्रक पकड़ कर पुलिस के सुपुर्द किये गए। 26 दिसंबर को जिला पंचायत सभागार में हुई पेपर मिल मालिकान व भाकियू (टिकैत) की आमने सामने की बैठक में यह मुद्दा फिर उछला। भाकियू (टि) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि नगर पालिकाओं का कूड़ा लाने वाले ट्रकों के टायरों में किसान भाला घोप देंगे।
उत्तर प्रदेश पेपर मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष पंकज अग्रवाल ने बैठक में दृढ़ता से कहा कि फैक्ट्रियों में राज्य सरकार द्वारा निर्धारित मानदंडों के अनुसार आरडीएफ प्रयोग किया जा रहा है, जिसकी रोज़ मॉनिटरिंग होती है। यदि कोई कारखानेदार पर्यावरण प्रदूषित करने वाले ज्ज्वलन शील पदार्थ उपयोग करता है तो उसके विरुद्ध कार्यवाही करें किन्तु फैक्ट्रियों पर दबाव का जो माहौल बना दिया गया है, उसमें कारखाने चलाना दुश्वार हो गया है। यही स्थिति रही तो पेपर मिलों की चाबियां प्रशासन को सौंप दी जायेंगी।
आम व्यक्ति जो पर्यावरण प्रदूषण से प्रभावित होता है, नहीं जानता कि आर.डी.एफ. क्या है। Refuse-Derived Fuel यानि कचरे से निकला ज्ज्वलन शील पदार्थ, जिसमें से प्लास्टिक, कांच आदि निकाल लिया जाता है। यह घरेलू कचरा फैक्ट्रियों में जलावन के रूप में इस्तेमाल होता आया है जिसमें कागज, गत्ता, पनालीदार बोर्ड आदि होते हैं। आरडीएफ तैयार करने के सरकारी ठेके दिये जाते हैं।
दो दिन पूर्व भी मुजफ्फरनगर के औद्योगिक संगठनों ने स्पष्टीकरण दिया था। पर्यावरण विभाग ने कूड़े के सैंपल भी लिये थे, जिनकी रिपोर्ट शीघ्र आ जाएगी। मुजफ्फरनगर का कागज उद्योग पहले ही कई समस्याओं से जूझ रहा है। आरडीएफ आपूर्ति व उसके प्रयोग में बाधा से उद्योग को क्षति पहुंचेगी जिससे लाखों लोग प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होंगे।
यह भी सर्वविदित है कि उद्यमी व औद्योगिक संगठन समाजसेवा के कार्यों में अग्रणी हैं। उदाहरण के लिए शामली के ग्राम सिक्का के पेपर मिल के मालिक राजेश्वर बंसल ने शामली में भैंसवाल रोड पर चौ. चरण सिंह के नाम पर बैंक्वेट हॉल बनाया हुआ है जिसका उपयोग किसान, मजदूर, आम लोग नाम मात्र के शुल्क पर करते हैं। लड़कियों की शादी में श्री बंसल 11,00 रुपये कन्यादान में देते हैं।
कारखानेदारों या उद्यमियों को हमेशा शोषक व मुनाफाखोर के रूप में देखना अनुचित है। समाज व देश की प्रगति में अन्नदाताओं के समान इनका भी योगदान है। किसान व उद्यमियों दोनों को पर्यावरण की रक्षा के लिये जागरूक रहना चाहिए।
गोविंद वर्मा (संपादक 'देहात')
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