कपसाड़ में जो हुआ

मेरठ के सरधना तहसील के ठाकुर बहुल गांव कपसाड़ में जो कुछ हुआ, उसे जुर्म की शर्मनाक घटना कह कर या औपचारिक पुलिसिया कार्रवाई करा के अथवा पीड़ित परिवार को दस लाख का चेक थमा कर या फिर दौराला चीनी मिल में किसी परिजन को नौकरी दिला कर शासन तंत्र चलाने वालों का चुप बैठना अपराध में शिरकत करना जैसा माना जाएगा।
पुलिस ने 48 घंटों के भीतर अपहृत लड़की की बरामदगी का वादा किया है। संभव है कि यह आश्वासन उस समय तक पूरा हो जाए, जब पाठकगण ये पंक्तियां पढ़ रहे हों। हमारी कामना है कि पुलिस का वादा शीघ्र फलीभूत हो। पीड़ित परिवार के सदस्यों ने दोषियों के एनकाउंटर तथा उनके मकानों को जमींदोज करने की भी मांग की है।
यदि ऐसा हो जाता है तो क्या मामला यहीं रुक जाना चाहिए? सपा प्रमुख अखिलेश यादव, बसपा सुप्रीमो मायावती, भीम आर्मी कमांडेंट चन्द्रशेखर ने घटना के लिए सरकार और सत्ता दल भाजपा को दोषी बताना शुरु कर दिया है। मेरठ के प्रभारी मंत्री धर्मसिंह ने कहा है कि सपा इसे जातीय रंग दे रही है। प्रश्न है कि यदि कोई वीभत्स और अवमानवीय घटना होती है तो सनसनी फैलना, लोगों का उत्तेजित होना और विपक्ष का हमलावर होना स्वाभाविक ही है। इस प्रकार के जघन्य हादसों पर मायावती, अखिलेश या अन्य विपक्षी चुप क्यों बैठे रहें?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश में माफियाओं, गुंडे बदमाशों तथा दुष्कर्मियों के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति बनाई है और उस पर अमल भी सख्ती से हो रहा है। योगी राज में गुंडा तो गुंडा है। कोई जाति या मजहबी भेदभाव नहीं। सरकार अपने स्तर पर ठीक काम कर रही है लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि ऐसे जघन्य कांड होते क्यों हैं? इन्हें रोक पाने में सर्वसमाज, नेताओं, राजनीतिक दलों तथा सामाजिक संगठनों की भूमिका क्या है?
सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों पर अत्याचारों को राजनीतिक दल स्वार्थपरता एवं वोट बैंक की दृष्टि से देखते हैं। दलित अत्याचार को भुनाने में सभी दल जुटे रहते हैं। ऐसे हजारों उदाहरण गिनाये जा सकते हैं।
दलित समाज का उत्पीड़न भारतीय समाजतंत्र का सबसे बड़ा कलंक है। दलित की बारात निकलने, उनके आमने सामने बैठने, कक्षा में फ्रंट सीट लेने या किसी होटल में मेज कुर्सी लगा भोजन करने पर कथित ऊंची जातियों या कथित मार्शल जातियों के लोग आपे से बाहर क्यों हो जाते हैं।
अभी 6 जनवरी को तेलंगाना के सिद्दिपेट के सरकारी मेडिकल कॉलेज की महिला सर्जन ने जहर का इंजेक्शन लगाकर आत्महत्या कर ली। इसी मेडिकल कॉलेज के एक डॉक्टर ने उससे प्रेम संबंध बढ़ाया। जब लड़की ने शादी करने को कहा तो, पुरुष डॉक्टर ने यह कहकर इंकार कर दिया कि तुम दलित हो, शादी नहीं करूंगा। नतीजतन महिला सर्जन ने हताश-निराश होकर खुदकुशी कर ली। यह कैसी सामाजिक व्यवस्था है? सिद्दिपेट और कपसाड़ बराबर क्यों हैं।
तेलंगाना में रेवंत रेड्डी हैं, राहुल हैं। उत्तर प्रदेश में योगी हैं। पक्ष-विपक्ष दलित उत्पीड़न पर राजनीति करना छोड़े और इन्हें इंसान माने, राजनीति का मोहरा नहीं।
इन दिनों वृंदावन में आरएसएस की स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने पर महत्वपूर्ण बैठक चल रही है। गांव गांव तक पहुंचने का कार्यक्रम बन गया है। सर्वसमाज तथा सनातन के हित की बात करने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष में दलित समाज के उत्पीड़न को रोकने और सर्वसमाज में उन्हें आत्मसात करे तो यह बड़ी कामयाबी होगी। कपसाड़ जैसी घटनाओं को रोकना सामाजिक उत्तरदायित्व है। इस चुनौती और लक्ष्य को सभी को स्वीकार करना होगा।
छपते-छपते: कपसाड़ कांड का मुख्य आरोपी गिरफ्तार, अपहृत लड़की बरामद।
गोविंद वर्मा (संपादक 'देहात')
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