अनुबंध कर्मचारियों की सेवा अवधि के लाभ पर सरकार को झटका, सुप्रीम कोर्ट से रिव्यू पिटीशन खारिज

HIGHLIGHTS
- हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2003 से सरकारी विभागों में अनुबंध आधार पर भर्तियां हो रही हैं।
- पहले अनुबंध कर्मचारियों को नियमित होने के लिए आठ साल तक इंतजार करना पड़ता था।
- नियमितीकरण की समयसीमा को अलग-अलग चरणों में घटाकर दो साल किया गया।
हिमाचल प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों से जुड़े एक अहम मामले में राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली है। अनुबंध कर्मचारियों को उनकी सेवा अवधि के लाभ देने से संबंधित हिमाचल प्रदेश रिक्रूटमेंट एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस ऑफ गवर्नमेंट एम्प्लॉइज एक्ट, 2024 को लेकर सरकार ने रिव्यू पिटीशन दाखिल की थी, जिसे शीर्ष अदालत ने खारिज कर दिया है। इस फैसले के बाद प्रदेश के करीब 1.50 लाख कर्मचारियों को राहत मिलने की उम्मीद बढ़ गई है।
यह मामला उन कर्मचारियों से संबंधित है, जिन्होंने नियमित नियुक्ति से पहले कई साल तक सरकारी विभागों में अनुबंध के आधार पर काम किया। कर्मचारियों की मांग है कि अनुबंध अवधि में दी गई सेवाओं को भी नियुक्ति की पहली तारीख से सेवा लाभ और वरिष्ठता की गणना में शामिल किया जाए।
इस मामले में कर्मचारियों को पहले हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट से राहत मिली थी। इसके बाद राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। अब रिव्यू पिटीशन भी खारिज होने के बाद सरकार के सामने अदालत के पूर्व फैसलों के अनुसार कार्रवाई करने का सवाल है।
2003 में शुरू हुई थी अनुबंध पर भर्ती की व्यवस्था
हिमाचल प्रदेश के सरकारी विभागों में वर्ष 2003 से अनुबंध आधार पर भर्तियां की जाती रही हैं। शुरुआत में अनुबंध कर्मचारियों को नियमित होने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता था। कई कर्मचारियों को नियमित नियुक्ति पाने से पहले आठ साल तक अनुबंध पर काम करना पड़ा।
बाद के वर्षों में अलग-अलग सरकारों ने नियमितीकरण के लिए तय अवधि में बदलाव किया। आठ साल की समयसीमा को घटाकर पहले सात, फिर पांच, तीन और अंत में दो साल कर दिया गया।
इसी दौरान अनुबंध कर्मचारियों ने मांग उठाई कि उनकी सेवा की गणना नियुक्ति की पहली तारीख से की जाए और उन्हें उसी आधार पर वित्तीय लाभ तथा वरिष्ठता दी जाए। इस मांग को लेकर कई कर्मचारी अदालत पहुंचे और अलग-अलग मामलों में उन्हें न्यायिक राहत मिली।
2024 के कानून को अदालत में दी गई चुनौती
अनुबंध कर्मचारियों के वित्तीय लाभ से जुड़े विवाद के बीच राज्य सरकार ने वर्ष 2024 में हिमाचल प्रदेश रिक्रूटमेंट एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस ऑफ गवर्नमेंट एम्प्लॉइज एक्ट पारित किया।
इस कानून में अनुबंध और नियमित कर्मचारियों की सेवा शर्तों को अलग-अलग रखने का प्रावधान किया गया था। इसके तहत अनुबंध पर बिताई गई अवधि को नियमित कर्मचारियों की सेवा शर्तों के समान लाभ देने के दायरे से बाहर रखा गया।
कर्मचारियों ने इस कानून के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। उनका कहना था कि इस व्यवस्था से अनुबंध अवधि में दी गई सेवाओं और उनसे जुड़े सेवा लाभों पर असर पड़ रहा है।
हाईकोर्ट ने 25 अप्रैल 2026 को सुनाया था फैसला
इस मामले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने 25 अप्रैल 2026 को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। देवेंद्र कुमार बनाम हिमाचल प्रदेश सरकार मामले से संबंधित कुल 445 याचिकाओं पर सुनवाई के बाद अदालत ने संबंधित कानून को असंवैधानिक घोषित करते हुए निरस्त कर दिया था।
हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के सेवा लाभ और वरिष्ठता से जुड़े दावों पर राहत दी थी। साथ ही सरकार को निर्धारित समय के भीतर जरूरी कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट में भी सरकार की याचिका खारिज
राज्य सरकार की ओर से दाखिल विशेष अनुमति याचिका (SLP) को सुप्रीम कोर्ट ने 29 जुलाई 2026 को खारिज कर दिया था। इसके साथ ही कर्मचारियों को मिलने वाले वित्तीय लाभों का भुगतान करने के लिए चार महीने की समयसीमा दिए जाने की जानकारी सामने आई थी।
इसके बाद सरकार ने फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग करते हुए रिव्यू पिटीशन दाखिल की। अब इस याचिका के खारिज होने से कर्मचारियों की उम्मीदें और बढ़ गई हैं।
हिमाचल हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुरेंद्र वर्मा के अनुसार, पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद सरकार के पास इस मामले में राहत पाने के विकल्प सीमित हो गए हैं। अब अदालतों के निर्देशों का पालन करना महत्वपूर्ण होगा।
सरकार पर पड़ सकता है हजारों करोड़ रुपये का बोझ
इस फैसले का असर राज्य सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर भी पड़ सकता है। उपलब्ध अनुमानों के मुताबिक, अनुबंध अवधि के वित्तीय लाभों का भुगतान करने में सरकार को करीब 8,000 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं। यह अनुमान लगभग डेढ़ लाख कर्मचारियों से जुड़े मामलों के आधार पर बताया जा रहा है।
इसके अलावा कर्मचारियों और पेंशनरों के वेतनमान के एरियर और अन्य लंबित वित्तीय लाभों का भुगतान भी सरकार के सामने चुनौती है। इन बकाया भुगतानों की अनुमानित राशि भी करीब 8,000 करोड़ रुपये बताई गई है।
इस तरह दोनों देनदारियों को मिलाकर राज्य सरकार पर लगभग 16,000 करोड़ रुपये का वित्तीय बोझ पड़ सकता है।
अब कर्मचारियों को सरकार के अगले कदम का इंतजार
सुप्रीम कोर्ट से रिव्यू पिटीशन खारिज होने के बाद अब कर्मचारियों की नजरें राज्य सरकार की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। कर्मचारी चाहते हैं कि अनुबंध अवधि में दी गई सेवाओं को पात्रता के अनुसार लाभों की गणना में शामिल किया जाए।
इसका असर केवल वेतन और एरियर पर ही नहीं, बल्कि वरिष्ठता और अन्य सेवा संबंधी लाभों पर भी पड़ सकता है। अब देखना होगा कि राज्य सरकार अदालत के निर्देशों को किस तरह लागू करती है और पात्र कर्मचारियों को उनका बकाया लाभ कब तक मिलता है।
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